पितृ पक्ष हिंदू धर्म में पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए समर्पित 15 दिनों का विशेष समय है, जो भाद्रपद पूर्णिमा से अश्विन अमावस्या तक चलता है।
श्राद्ध का अर्थ है श्रद्धा के साथ पूर्वजों को स्मरण कर उन्हें तर्पण देना। इसे धार्मिक कर्तव्य और पूर्वजों के प्रति सम्मान माना जाता है।
पितृ पक्ष के दौरान परिवार के लोग अपने पूर्वजों के लिए भोजन, जल, और तिल का अर्पण करते हैं। यह कर्मकांड उन्हें संतुष्ट करने के लिए किया जाता है।
पिंडदान पितृ पक्ष का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसमें अन्न के गोले (पिंड) बनाकर उन्हें जल में अर्पण किया जाता है ताकि पूर्वजों की आत्मा को मोक्ष प्राप्त हो सके।
पितरों के निधन के दिन के आधार पर पितृ पक्ष में उनकी तिथि पर श्राद्ध किया जाता है। जैसे, जिनका निधन प्रतिपदा को हुआ हो, उनका श्राद्ध उसी दिन किया जाता है।
गया (बिहार) श्राद्ध के लिए सबसे प्रसिद्ध तीर्थस्थल है, जहां लाखों श्रद्धालु पिंडदान करने जाते हैं। माना जाता है कि यहां श्राद्ध करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
तर्पण में काले तिल, जल, कुश और चावल का उपयोग होता है। इसे पवित्र नदी या किसी जलाशय के पास किया जाता है। इससे पितरों को शांति और संतुष्टि मिलती है।
अगर किसी परिवार में पितृ दोष होता है, तो पितृ पक्ष में श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने से इस दोष का निवारण होता है और घर में सुख-शांति आती है।
आमतौर पर परिवार के बड़े बेटे या पुरुष सदस्य श्राद्ध करते हैं, लेकिन अगर कोई पुरुष उपलब्ध न हो, तो महिलाएं भी श्राद्ध कर सकती हैं
ऐसा माना जाता है कि पितृ पक्ष के दौरान विधिपूर्वक श्राद्ध करने से पितर प्रसन्न होते हैं और परिवार को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।